Wednesday, September 20, 2017
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आनंदपाल की लाश बिना न्यायिक जाँच क़े घातक रहस्य छोड़ जाएगी !

 

कुख्यात गैंगस्टर आनंदपाल की कहानी फौरी तौर पर फिल्मी मसाला नज़र आता है: खून, अन्याय, ग्लैमर, पुलिस और राजनीति की मिलीभगत पर नयी फिल्म तैयार हो सकती है | आनंदपाल ने एक दशक तक खौफ पैदा किया, हत्याएं और लूट की अकूत संपत्ति इकट्ठी की| उसका अंत तय था–उसे ज़िंदा या मुर्दा पुलिस को मिलना ही था|

लेकिन आनंदपाल की कहानी बहुत बड़ी सीख भी हो सकती है क्योंकि राजस्थान की राजनीति अभी भी बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बंगाल से बेहतर है| यहाँ राजनीति और क्राइम की साठगांठ इतनी उजागर नहीं है| हाँ, चम्बल के डकैतों की समस्या ज़रूर रही है लेकिन उनका राजनीति पर प्रभाव नगण्य रहा है|

पहला आपराधिक लक्षण ही अगर मुस्तैदी से संभाल लिया जाए तो राजस्थान की सभ्य समाज की छवि बानी रह सकती है| वो भी ऐसे वक्त जब टूरिज्म को प्रमोट करने की मुहिम तेजी से चल रही है| लॉ एंड आर्डर टूरिज्म को बढ़ावा देता है, यह सर्वमान्य है|

 आनंदपाल का मामला अगर क्राइम, पॉलीटिक्स, पुलिस, पैसा और नौकरशाही की साठगांठ के नज़रिये से देखा जाए तो एन.एन. वोरा कमिटी की दशकों पुरानी रिपोर्ट याद आती है| वोरा समिति ने इस साठगांठ को उजागर किया था और बताया की इस तंत्र की ताकत बढ़ रही है| वोरा अब जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल हैं और देश के गृह तथा रक्षा सचिव रह चुके हैं |

प्रश्न उठता है कि क्या सीबीआई जाँच ये सभी सच बाहर ला पायेगी| नहीं!

ये आम चर्चा है कि आनंदपाल की राजनैतिक प्रतिद्वंदता कांग्रेस के कद्दावर जाट नेता तथा उस समय के मंत्री हरजीराम बुद्रक से रही थी| आनंदपाल हरजीराम के बेटे से प्रधानी के चुनाव में मात्र 3 वोट से हारा था| प्रधान की हैसियत एक विधायक क़े बराबर होती है| इस हार क़े बाद आनंदपाल पर धमकी देने क़े तथाकथित आरोप लगे और केस दर्ज़ हुए| आनंदपाल का पक्ष मानता है कि ये केस राजनीति से प्रेरित थे तथा पुलिस अपने आकाओं को खुश करने में लगी थी|

इस वक्त एक अपराधी आनंदपाल का जन्म हुआ बताया जाता है जिसमें एंग्री यंग मैन अमिताभ बच्चन जैसी बदले की भावना थी लेकिन बंदूक की ताकत उसे अपराध की ओर ले गई और वो बैरल की ताकत एन्जॉय करने लगा| अमिताभ बच्चन क़े कालिया वाले किरदार की तरह वो पुलिस हिरासत से भागता रहा|

बताया जाता है कि बीजेपी क़े मंत्री युनूस खान उससे मिलने बीकानेर जेल भी गए थे| उस वक्त क़े अख़बारों ने रिपोर्ट भी किया था| आनंदपाल ने असल में बीजेपी क़े टिकट पर ही प्रधानी का चुनाव लड़ा था| वैसे तो युनूस खान और आनंदपाल दोनों नागौर जिले से हैं|

कुछ लोग इसे जाट-राजपूत की परंपरागत प्रतिस्पर्धा से जोड़ क़े देख रहे हैं तो कुछ लोग पूरी राजनीति को नंगा होते देख रहे हैं|

आनंदपाल अब लोगों को मात्र राजपूतों की लड़ाई का हथियार नज़र आ रहा है क्योंकि वो ही उसकी लाश को संस्कार नहीं करने दे रहे हैं, ये कह कर की आनंदपाल फ़र्ज़ी मुठभेड़ में मारा गया है| अगर वो पुलिस की गिरफ्त में था तो और मारा गया तो वैसे भी मजिस्ट्रीयल इन्क्वायरी बनती है|

असल में वोरा समिति की भावना को समझते हुए एक हाईकोर्ट स्तर की न्यायिक जाँच की ज़रुरत है जो इस मामले क़े राजनैतिक, प्रशासनिक तथा पुलिस क़े दुरपयोग की भी जाँच करे|

राजपूत समाज और आनंदपाल का परिवार 11 दिन बाद भी उसका अंतिम संस्कार करने को तैयार नहीं है, जब-तक की सीबीआई इन्क्वायरी नहीं आर्डर होती है| राजनीति अपना रंग लेती रहेगी, लेकिन न्याय इंतजार नहीं कर सकता और सिस्टम की सड़न बाहर लाना जरुरी है|

Writer : संजय शर्मा, एडिटर इन चीफ, न्यूज़ इंडिया

(ये लेखक क़े निजी विचार हैं, इनके लिए न्यूज़ इंडिया की कोई ज़िम्मेदारी नहीं है)

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